प्रलय से परिणय तक
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प्रस्तुत कहानी है तो आधुनिक युग की मगर इस युग में भी वे पौराणिक प्रसंग घटित होते रहते हैं, जो प्राचीनकालिक राक्षसों/दानवों द्वारा वायुमंडल को दूषित करते रहते थे। सृष्टि निर्माण के समय विधाता ने निश्चित ही कुछ इंसानों में हैवानी हवस इतनी कूट कूट कर भर दी होगी, जो युगों से मानवता को कलंकित करते आ रहे हैं। ये ऐसे रक्तबीज हैं जिनके जीवाश्म सदियों तक फिर-फिर आकार लेकर अपने दुष्कर्मों से इतिहास को दोहराते रहते हैं। फिर चाहे कितने भी अवतार जन्म लेते रहें मगर इन रक्तबीजों का जड़ मूल से समापन असंभव हो जाता है, क्योंकि इनका पोषण उजले चेहरों वाले छिपे हुए रक्तबीजों द्वारा ही होता आया है अतः ये रूप बदल-बदल कर हर युग के अवतारों पर भी हावी होते रहते हैं।
ऐसे ही किसी रक्तबीज की हवस का परिणाम थी, दिल्ली के एक अभावग्रस्त अनाथालय में पलने वाली एक अबोध बालिका नयना...जिसे जन्म देकर एक शिशु-अनाथाश्रम के बाहर टंगे हुए पालने में छोड़कर उसकी माँ ने यमुना में कूदकर जान दे दी थी। उसने अपनी नवजात बच्ची के साथ रखे हुए अपने सुसाइड नोट में आत्महत्या का कारण स्पष्ट लिखा था मगर उस औरत की हैसियत या पहचान गौण रही होगी अतः उस रक्तबीज को उजले मुखौटों वाले रक्तबीजों द्वारा निर्दोष करार देकर फ़ाइल बंद कर दी गई थी।
